खुशी को लेकर हमारी सोच बड़ी अजीब हो गई है।
हम उसे ढूंढते हैं, चाहते हैं, उसके पीछे भागते हैं, लेकिन जब वह पास आती है तो हम उसे थामने से डरते हैं।
कभी लगता है कि अगर हमने खुलकर खुश होना स्वीकार कर लिया, तो कहीं कुछ छिन न जाए।
कभी लगता है कि अगर हमने अपनी खुशी बाँट ली, तो वह कम हो जाएगी।
यही सबसे बड़ी भूल है।
खुशी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो खर्च हो जाए।
वह कोई संपत्ति नहीं है जिसे संभालकर रखना पड़े।
वह कोई पुरस्कार नहीं है जो सिर्फ कुछ लोगों को ही मिल सके।
खुशी एक अनुभव है।
और अनुभव बाँटने से घटते नहीं, बढ़ते हैं।
हमने खुशी को दुर्लभ क्यों मान लिया
हम बचपन से ही तुलना के माहौल में बड़े होते हैं।
स्कूल में नंबरों की तुलना होती है।
घर में अपेक्षाओं की तुलना होती है।
बाद में नौकरी, पैसे, रिश्तों और उपलब्धियों की तुलना होने लगती है।
धीरे धीरे हमारे मन में एक धारणा बैठ जाती है।
जैसे खुशी सीमित हो।
जैसे अगर किसी और के पास ज़्यादा है, तो हमारे पास कम रह जाएगी।
हम यह मान लेते हैं कि जीवन एक दौड़ है।
और दौड़ में कोई आगे निकलता है तो कोई पीछे रह जाता है।
लेकिन खुशी कोई दौड़ नहीं है।
यह कोई प्रतियोगिता नहीं है।
यह कोई ट्रॉफी नहीं है जो एक के हाथ में गई तो दूसरे के हाथ से निकल गई।
यह सोच हमें अंदर से थका देती है।
खुशी बाँटने से डर क्यों लगता है
अक्सर लोग खुश होते हुए भी उसे छिपा लेते हैं।
उसके पीछे कई डर होते हैं।
कभी लगता है कि सामने वाला दुखी है, इसलिए अपनी खुशी दिखाना गलत होगा।
कभी लगता है कि लोग नज़र लगा देंगे।
कभी लगता है कि ज्यादा खुश होने पर ज़िंदगी कुछ छीन लेगी।
कभी लगता है कि लोग जज करेंगे।
इसलिए हम अपनी खुशी को छोटा बना देते हैं।
अपनी उपलब्धियों को हल्का कर देते हैं।
अपने अच्छे पलों पर भी सफाई देने लगते हैं।
लेकिन सच यह है कि खुशी को दबाना संवेदनशीलता नहीं है।
यह डर है।
और डर के साथ जी गई ज़िंदगी कभी पूरी नहीं लगती।
खुशी दिखाना और खुशी जीना अलग बातें हैं
बहुत बार लोग खुशी को दिखावा समझ लेते हैं।
लेकिन असली खुशी दिखावे की मोहताज नहीं होती।
वह चिल्लाती नहीं।
वह ध्यान नहीं माँगती।
वह दूसरों को नीचा दिखाकर खुद को ऊँचा नहीं बनाती।
असली खुशी शांत होती है।
स्थिर होती है।
और सबसे खास बात यह कि वह दूसरों की खुशी से डरती नहीं।
जब हम अपनी खुशी बाँटते हैं, तो हम कोई प्रदर्शन नहीं कर रहे होते।
हम बस यह स्वीकार कर रहे होते हैं कि जीवन में अच्छा भी हो सकता है।
विज्ञान भी यही कहता है
आज का विज्ञान भी यही बताता है कि खुशी बाँटने से बढ़ती है।
जब हम किसी की तारीफ करते हैं, किसी के लिए सच में खुश होते हैं, किसी की मदद करते हैं, तो हमारे दिमाग में ऐसे रसायन बनते हैं जो तनाव कम करते हैं और जुड़ाव बढ़ाते हैं।
इसलिए किसी के लिए कुछ अच्छा करने के बाद हमें भीतर से सुकून महसूस होता है।
इसलिए किसी और की खुशी में शामिल होने से मन हल्का लगता है।
हम इंसान ऐसे ही बने हैं।
हम बाँटने के लिए बने हैं, जमा करने के लिए नहीं।
तुलना खुशी की सबसे बड़ी दुश्मन है
तुलना अपने आप में गलत नहीं है।
लेकिन जब वह आत्मसम्मान पर चोट करने लगे, तब वह ज़हर बन जाती है।
जब हम अपनी खुशी को दूसरों की खुशी से तौलने लगते हैं, तब समस्या शुरू होती है।
किसी और की मुस्कान हमें अपनी कमी लगने लगती है।
किसी और की सफलता हमें अपनी असफलता लगने लगती है।
खुशी बाँटना इस तुलना को तोड़ देता है।
जब हम दिल से किसी और के लिए खुश होते हैं, तो हमारा मन यह मानना बंद कर देता है कि ज़िंदगी सीमित है।
भावनात्मक उदारता क्या होती है
भावनात्मक उदारता का मतलब है बिना किसी स्वार्थ के भावनात्मक गर्माहट देना।
किसी की बात ध्यान से सुनना।
किसी की मेहनत को पहचान देना।
किसी के अच्छे समय में ईमानदारी से शामिल होना।
यह चीज़ें छोटी लगती हैं।
लेकिन इनसे रिश्तों में भरोसा बनता है।
और जहाँ भरोसा होता है, वहाँ खुशी टिकती है।
खुशी कोई इनाम नहीं है
बहुत लोग सोचते हैं कि पहले सब सही होगा, तब खुश होंगे।
पहले पैसे आएँगे, तब खुश होंगे।
पहले मंज़िल मिलेगी, तब खुश होंगे।
लेकिन अगर खुशी को हमेशा भविष्य में टालते रहेंगे, तो वह कभी आएगी ही नहीं।
खुशी कोई इनाम नहीं है।
वह जीवन जीने का तरीका है।
और जब हम उसे बाँटना शुरू करते हैं, तो वह वर्तमान में आ जाती है।
खुलकर खुश होना भी हिम्मत माँगता है
आज की दुनिया में खुश रहना आसान नहीं है।
चारों तरफ तनाव है, तुलना है, असंतोष है।
ऐसे माहौल में शांत और संतुलित रहना भी एक तरह की बहादुरी है।
यह खुशी नाटक नहीं होती।
यह दर्द से भागना नहीं होता।
यह बस यह मानना होता है कि सब कुछ खराब नहीं है।
और यह मानना दूसरों को भी राहत देता है।
खुशी कैसे फैलती है
खुशी बड़े भाषणों से नहीं फैलती।
वह छोटे छोटे पलों से फैलती है।
एक सच्ची तारीफ।
एक धन्यवाद।
एक मुस्कान।
एक सच्ची शुभकामना।
ये पल किसी की पूरी ज़िंदगी नहीं बदलते, लेकिन किसी के दिन को ज़रूर बदल सकते हैं।
और कभी कभी वही काफी होता है।
खुशी खो जाने का डर
कुछ लोग इसलिए खुश नहीं होते क्योंकि उन्हें डर लगता है कि यह टिकेगी नहीं।
लेकिन खुशी को न जीना उसे बचाना नहीं है।
यह खुद को खाली करना है।
खुशी को दबाने से दुख कम नहीं होता।
बस जीवन फीका हो जाता है।
जो पल मिला है, उसे जीना सीखना ही असली समझदारी है।
रोज़मर्रा में खुशी बाँटना कैसे शुरू करें
इसके लिए कोई बड़ा कदम नहीं चाहिए।
अच्छा लगे तो बोल दें।
किसी के लिए अच्छा सोचें।
अपने अच्छे पलों को छोटा न बनाएं।
और दूसरों की खुशी से डरें नहीं।
खुशी को बाहर जाने दें।
एक सच्चाई जिसे हम बार बार भूल जाते हैं
खुशी अकेले जीने की चीज़ नहीं है।
वह जुड़ाव में पनपती है।
साझा करने में गहरी होती है।
और देने में मजबूत बनती है।
जब हम यह समझ जाते हैं, तो ज़िंदगी हल्की लगने लगती है।
अंत में
बहुत से लोग इसलिए दुखी नहीं हैं कि उनके जीवन में अच्छा नहीं है।
वे इसलिए दुखी हैं क्योंकि उन्होंने खुशी को रोकना सीख लिया है।
सच बहुत सरल है।
खुशी बाँटने से कम नहीं होती।
वह बढ़ती है।
और जब हम इसे मान लेते हैं, तो जीवन थोड़ा और मानवीय लगने लगता है।