आज की दुनिया बोलने वालों की है।
जो जितना ज़्यादा बताता है, उसे उतना ही सच्चा माना जाता है।
जो जितना खुलकर सबके सामने रख देता है, वही ज़्यादा real समझा जाता है।
सोशल मीडिया ने हमें यह आदत डाल दी है कि अगर हमने अपनी ज़िंदगी नहीं दिखाई, तो शायद हमने कुछ जिया ही नहीं।
हर भावना, हर फैसला, हर परेशानी जैसे सबके सामने रखना ज़रूरी हो गया है।
लेकिन ज़िंदगी धीरे-धीरे एक और बात सिखाती है।
हर बात कहना ज़रूरी नहीं होता।
हर चीज़ साझा करना समझदारी नहीं होती।
और हर इंसान आपकी बात को सही नज़र से देखने वाला नहीं होता।
खुद तक रखना कमज़ोरी नहीं है।
यह समझदारी है।
क्यों किसी से बात करना अच्छा लगता है, लेकिन बाद में मन भारी हो जाता है
जब हम किसी से अपनी बात कहते हैं, मन को याद आती है। लगता है किसी ने सुन लिया, किसी ने समझ लिया।
उस पल हल्कापन महसूस होता है।
लेकिन अक्सर हम यह नहीं सोचते कि जिस पल हम किसी को अपनी निजी बात बताते हैं, उसी पल वह बात हमारे हाथ से निकल जाती है।
अब वह उस इंसान की सोच, उसकी तुलना, उसकी राय और कभी-कभी उसकी ईर्ष्या से जुड़ जाती है।
फिर वही बात हमें उलझाने लगती है।
फिर वही फैसला हमें शक में डाल देता है।
खुद तक रखने की आदत इस उलझन से बचाती है।
सपनों को तालियों से ज़्यादा सुरक्षा चाहिए
अक्सर लोग अपने सपनों के बारे में बहुत जल्दी बात कर देते हैं। काम शुरू होने से पहले ही सबको बता देते हैं कि क्या करने वाले हैं।
लेकिन सपने शुरुआत में बहुत नाज़ुक होते हैं। किसी का एक सवाल, एक ताना, या एक हंसी पूरे जोश को खत्म कर सकती है।
कई लोग आपको रोकते हैं, इसलिए नहीं कि वे बुरे हैं, बल्कि इसलिए क्योंकि वे खुद रुक गए थे।
जब आप अपने सपनों को अपने तक रखते हैं, आप खुलकर काम करते हैं।
गलती होती है तो डर नहीं लगता।
रास्ता बदलते हैं तो सफाई नहीं देनी पड़ती।
जब नतीजे आते हैं, वे खुद बोलते हैं।
आपकी ज़िंदगी दिखाने की चीज़ नहीं है
आप कैसे रहते हैं, क्या पहनते हैं, कहां जाते हैं, किसके साथ समय बिताते हैं, यह सब बताना ज़रूरी नहीं।
जब लोग आपकी ज़िंदगी के अंदर झांकने लगते हैं, तो तुलना शुरू हो जाती है।
कोई कहता है आप बदल गए हो।
कोई कहता है पहले जैसे नहीं रहे।
कोई बिना पूछे राय देने लगता है।
खुद तक रखने से यह सब शोर बंद हो जाता है।
आप खुश होने के लिए किसी को साबित नहीं करते।
आप सुकून को बस जीते हैं।
अच्छा इंसान होने की घोषणा नहीं करनी पड़ती
जो लोग बार-बार बताते हैं कि वे कितने अच्छे हैं, कितने समझदार हैं, अक्सर वही लोग भीतर से सबसे ज़्यादा बेचैन होते हैं।
अच्छाई बोलने से नहीं दिखती।
वह तब दिखती है जब आप गुस्से में भी सही रहते हैं।
जब कोई नहीं देख रहा होता, तब भी।
खुद तक रखना आपको ज़मीन से जुड़ा रखता है।
खुद को बेहतर बनाना एक अंदरूनी सफ़र है
खुद पर काम करना कोई दिखाने की चीज़ नहीं है। यह धीरे-धीरे, अकेले में होता है।
जब इसे बहुत ज़्यादा बताया जाता है, तो यह दिखावा बन जाता है।
आप सीखने से पहले समझाने लगते हैं।
आप बदलने से पहले बताने लगते हैं।
कुछ बदलाव चुपचाप होते हैं।
और वही टिकते हैं।
घर की बातें बाहर नहीं ले जाई जातीं
हर परिवार में उलझनें होती हैं। हर घर में कुछ ऐसे पल होते हैं जिन पर समय चाहिए, भीड़ नहीं।
जब ये बातें बाहर जाती हैं, तो अक्सर रिश्ते और बिगड़ जाते हैं।
लोग आधी बात सुनकर पूरा फैसला सुना देते हैं।
एक मुश्किल दौर हमेशा की पहचान बन जाता है।
खुद तक रखना रिश्तों को बचाने का तरीका होता है।
हर सुनी हुई बात आगे बढ़ाना ज़रूरी नहीं
हर कड़वी बात को दोहराना मजबूरी नहीं।
हर अफवाह को फैलाना ज़िम्मेदारी नहीं।
समझदार इंसान तय करता है कि उसकी आवाज़ से क्या आगे जाएगा।
खुद तक रखने से इंसान मज़बूत बनता है
जब आप हर किसी को जवाब देना बंद करते हैं, मन हल्का होने लगता है।
जब आप हर फैसले पर सफाई नहीं देते, आत्मविश्वास बढ़ता है।
जब आप हर सवाल को गंभीरता से लेना छोड़ते हैं, शांति लौटती है।
खुद पर भरोसा बढ़ता है।
हर किसी को आपकी ज़िंदगी समझ में नहीं आएगी
और यह ठीक है।
हर किसी को सब कुछ बताना ज़रूरी नहीं।
हर किसी को अंदर आने की इजाज़त नहीं।
आपकी ज़िंदगी की कुछ बातें सिर्फ आपकी होती हैं।
और उन्हें अपने तक रखना ही उनकी ताकत है।